सरदार पटेल के राजनीतिक भगवाकरण के मायने

आजकल अचानक ठीक चुनावो से पहले  किसी न किसी का नाम लेकर ध्रुवीकरण की कोशिश करना ,मानो एक चलन हो गया है.ऐसे ही एक चलन का शिकार हुए लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल.कहने की ज़रुरत नहीं है की आज जिन सरदार पटेल के नाम को  लेकर साम्प्रदायिकता के पैमाने पर समाज को बाटने की कोशिश की जा रही है, शायद ये उस संकल्पना के ठीक उल्टा है जिसका  सपना सरदार पटेल ने देखा उसको एक हद तक पूरा भी किया और दिया एक संगठित राष्ट्र.

उन्होंने कभी सोचा भी न होगा की एक दिन उनके और अन्य साथियों द्वारा निर्माण किये गए इस राष्ट्र में उन्ही का नाम लेकर देश को तोड़ने की कवायद की जायेगी और और सांप्रदायिक ताकतों को बल दिया जायेगा.

कुछ लोगो के द्वारा ऐसा दुष्प्रचार किया जाता रहा है की सरदार पटेल के प्रधानमंत्री न बन पाने के पीछे कांग्रेस की राजनीति रही.इस सच को जानने के लिए मैंने इतिहास की कई किताबो को खंगाला,इतिहासकारो से बात की तो  समझ आया की जो लोग ऐसा बोलते है या तो उन्होंने सरदार पटेल के बारे में पढ़ा  नहीं है या उनके समझने की शक्ति बहुत कम है.उन्हें तो बस इसका राजनीतिक फयदा उठाना है.

आश्चर्य की बात ये है की यह सब बातें वो लोग कर रहे है जिनका स्वंत्रता संग्राम में कभी कोई योगदान ही नहीं रहा.शायद उन्हें इस बात का डर सता रहा है की जब इतिहास के दर्ज़ पन्नो में उनका कही नामोनिशान है ही नहीं, तो वो कैसे अपने राजनीतिक वर्चस्व को बचाएँ ? कहने की ज़रुरत नहीं की आरएसएस हमेशा से ही भाजपा के लिए एक थिंक टैंक का काम करता रहा है और उसी ने अब आगामी लोकसभा चुनावो से पहले हिन्दू राष्ट्र एवं हिंदुत्व का मुद्दा उठा दिया है और उसको जोड़ दिया है सरदार पटेल से.

क्या वास्तव में सरदार पटेल एक हिन्दू राष्ट्र के समर्थक थे, या ये सिर्फ आरएसएस की एक सोची समझी साजिश है? वीर सावरकर के पद चिन्हों पर चलने वाले शायद ये बात जानते हो की यह वही सावरकर है जिन्होंने अंग्रेजी सरकार  से माफ़ी मांगी और अंग्रेज़ सरकार को माफीनामे में लिखा “अगर सरकार अपनी असीम भलमनसाहत और दयालुता से मुझे रिहा करती है ,मैं यकीन दिलाता हूँ कि मैं संविधानवादी विकास का सबसे कट्टर समर्थक रहूंगा और अंग्रेज़ सरकार के प्रति बफादार रहूँगा”.

दूसरी तरफ सरदार पटेल हमेशा एक हिंदुत्ववादी राष्ट्र के धुर विरोधी रहे.उनके अनुसार हिन्दू राष्ट्र कि कल्पना करना विनाशकारी भी है और एक हद तक पागलपन की निशानी भी.सरदार पटेल और नेहरू,दोनों को इस बात का डर था की साम्प्रदयिक ताकतें भारत को तोड़ डालेंगी.नेहरू ने लिखा भी कि “यदि सम्प्रदियकता को खुलकर खेलने दिया तो ये भारत को तोड़ देंगी ” इसी तरह सरदर पटेल ने कांग्रेस के एक अधिवेशन में कहा “कांग्रेस और सरकार इस बात कि लिए प्रतिबद्ध है कि भारत एक सच्चा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हो”

भारतीय राजनीति में आज़ादी से पहले और उसके तीस साल बाद तक हिन्दू सम्प्रदायवाद और इसके संघटन हिन्दू महासभा ,आरएसएस और जनसंघ  हाशिये कि ताकत बनकर रह गए जो विभाजन के दंगो (१९४६-४७) के दौरान ही थोड़ी देर के लिए उभरे थे .सन १९४७ में भारत विभाजन एवं उसके साथ ही उत्पन्न बर्बर एवं भयावह दंगो के बावजूद भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की एक बहुत बड़ी जीत यह थी कि भारतीय जनता ने धर्मनिरपेक्षता को एक बुनियादी मूल्य के रूप में स्वीकार किया और एक सेक्युलर राष्ट्र एवं समाज के निर्माण की ओर प्रस्थान किया.

कुछ लोगो का कहना है की धर्म और राजनीति के अलगाव के अर्थ में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा गाँधी जी को मान्य नहीं थी क्योंकि वह अक्सर कहा करते थे की दोनों को अलग नहीं किया जा सकता परन्तु उन्होंने १९४२ में यह भी कहा कि “धर्म एक व्यक्तिगत मामला है जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चहिये और इसको राष्ट्रीय मामलो से बिल्कुल  नहीं जोड़ा जाना चहिये”.

वही दूसरी तरफ सावरकर,आरएसएस और हिन्दू महासभा का कहना था कि भारत केवल एक ही राष्ट्र है -हिन्दू राष्ट्र .नेहरू ,आरएसएस को एक फांसीवादी संघटन मानते थे .दिसंबर १९४७ में उन्होंने लिखा “हमारे पास बहुत सारे साक्ष्य मौजूद है जिनसे दिखाया जा सकता है कि आरएसएस एक ऐसा संघटन है जिसका चरित्र एक निजी सेना कि तरह है और जो निश्चित तौर पर नाज़ी आधारों पर आगे बढ़ रही है,यहाँ तक कि उसके संघटन की तकनीकों का पालन भी कर रही है.(आज़ादी के बाद का भारत-बिपिन चंद्र)

१८ जुलाई १९४८ को सरदार पटेल ने हिन्दू महासभा के नेता श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को पत्र लिखते हुए कहा “जहाँ तक आरएसएस और हिन्दू महासभा की बात है,गाँधी जी की हत्या का मामला अदालत में है और इन दोनों संघटनो की भागीदारी के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना चहिये ,लेकिन हमे मिली रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है की इन दोनों संस्थाओं का खासकर आरएसएस की गतिविधयों के फलस्वरूप देश में ऐसा माहौल बना की ऐसा बर्बर काण्ड संभव हो सका.मेरे दिमाग में कोई संदेह नहीं है कि हिन्दू महासभा का एक अतिवादी भाग षड्यंत्र में शामिल था.आरएसएस कि गतिविधियां सरकार और राज्य व्यवस्था के अस्तित्व के लिए खतरा हैं.हमे मिली रिपोर्ट बताती है कि प्रतिबन्ध के बावज़ूद गतिविधयां अभी समाप्त नहीं हुई हैं.दरअसल समय बीतने के साथ आरएसएस कि टोली उग्र हो रही है और विनाशकारी गतिविधयों में बढ़चढ़ कर हिस्सा ले रही है.

गाँधी जी की हत्या के बाद भी सरकार नहीं चाहती थी की उसे दमनकारी नीति उठानी पड़े .२९ जून १९४९ को नेहरू ने सरदार पटेल को पत्र लिखा “मौज़ूदा परिस्थियों में ऐसे प्रतिबन्ध और गिरफ्तारियां जितनी कम हो,उतना ही अच्छा हैं”.आरएसएस ने पटेल की शर्तो को स्वीकार कर लिया और इसके तुरंत बाद ही १९४९ में आरएसएस पर से प्रतिबन्ध हटा लिया.ये शर्ते थी (१) आरएसएस एक लिखित और प्रकाशित संविधान स्वीकार करेगा.(२) अपने आप को सांस्कृतिक गतिविधयों तक सीमित रखेगा (३) राजनीति में कोई दखलंदाजी नहीं देगा.(४) हिंसा और गोपनीयता का त्याग करेगा (५) भारतीय झंडा और संविधान के प्रति आस्था प्रकट करेगा.

आधुनिक भारत के कर्णधारो में सरदार पटेल और नेहरू दोनों का ही राष्ट्रीय एकता और उसके निर्माता के रूप में बहुत योगदान है.एक ने राष्ट्रीय प्रगति की तो दूसरे ने उसे गति प्रदान की.नेहरू ने स्वयं भी सरदार पटेल को “राष्ट्रीय एकता के शिल्पी” नाम दिया है.इन दोनों ही नेताओं का स्वाधीनता के बाद से ही अधिकार और उत्तरदायित्व ,दोनों ही दृष्ट्रयीओं से स्थान और योगदान रहा है.

सरदार पटेल के जीवनकाल में उनके और नेहरू के विचारों के अंतर  को जिस तरह बड़ा चढ़ाकर और तोड़ मरोड़कर कर उन दिनों जिस प्रकार पेश किया जाता और उस से जिस प्रकार अटकलों और राजनीतिक चालबाजियों से लोगो को गुमराह करने के जो निम्न स्तरीय हथकंडे तब भी किये जाते थे और वो हतकंडे  आज भी चलाये जा  रहे है.सरदार पटेल और नेहरू यह बात अच्छी तरह से जानते थे.यही वजह रही की समय समय पर दोनों ही नेताओं ने जनता को आगाह करते हुए इन प्रचारों का शिकार न बन ने की सलाह दी थी.

३ अक्टूबर १९४८ को एक सम्मेलन में पटेल ने कहा “मैं हिन्दुस्तान में रहने वाले सब लोगो को ख़ास तौर पर कहना चाहता हूँ की आप ये न समझीये की यह गवर्नमेंट तो केपटिलिस्ट   की है,हालाँकि बार बार आप लोगो को ऐसी बातें कही जाती है.लेबर में काम करने वाले हमारे कई दोस्त ,जो हमारे साथ मिलते नहीं है,अपने अलग ख़यालात रखते है.आज हमारे जो लीडर (हमारे प्रधानमंत्री) हैं,वही ट्रेड यूनियन कांग्रेस के पहले प्रेसिडेंट थे .उन्होंने उसकी बुनियाद डाली.उनसे (नेहरू ) बढ़कर मज़दूर का हित चाहने वाला कोई और मैंने देखा नहीं हैं. कुछ लोग समझते हैं की हम ऐसे बेवकूफ हैं की मुल्क की आज़ादी के लिए ज़िंदगी भर साथ रहने के बाद अब हम आपस में इस प्रकार की लड़ाई कर लेंगे और अपनी दो पार्टियां बनाएंगे .यदि में अपने लीडर (नेहरू) का साथ न दे सकूं तो में एक मिनट भी गवर्नमेंट में न रहूंगा .यह मेरा काम नहीं हैं.इस तरह की बेबफ़ाई करना मेरे चरित्र में नहीं हैं.”(आज़ादी के बाद का भारत-बिपिन चंद्र)

सरदार पटेल ने पद प्रतिष्ठा कि दौड़ से खुद को बहार रखकर गांधी का सम्मान बढ़ाया और किसी तपस्वी कि तरह वे राष्ट्रीय एकता को स्थापित करने में लगे रहे.आज यह समझने कि ज़रुरत है कि राष्ट्रीय एकता के लिए सांप्रादियक राजनीति से ऊपर बढ़कर आगे आये.

आज के परिप्रेक्ष्य में जब नरेंद्र मोदी सरदार पटेल को अपना नेता मानते है, और यदि हाँ ,तो फिर उन्हें सरदार पटेल कि “धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धता” के प्रति निष्ठा दिखाते हुए कानून पर अमल करते हुए हिन्दू राष्ट्र के लिए अपने हथियार उठाने का आवाह्न करने वाले संघटनों ,नेताओं पर सख्त कदम उठाने कि ज़रुरत है वरना सरदार पटेल को अपना नेता कहना कोरे तौर पर बेमानी होगा और भाजपा  एवं संघ का राजनीतिक षड्यंत्र होगा.

इसके साथ ही उन्हें ये भी आश्वस्त करना होगा कि नेहरू पटेल की जिस  जोड़ी ने जो अखंड लोकतान्त्रिक भारत दिया था,आरएसएस उसका गला नहीं घोटेंगी और उसको सांप्रादियक  ताकतों के द्वारा तोडा नहीं जायेगा,पर जिस तरह के संकेत आ रहे हैं उस से लगता है कि भारत का लोकतंत्र और इसकी लोकतान्त्रिक विरासत खतरे में है.

आशीष रघुवंशी

नई दिल्ली